Tuesday, 4 August 2020

एक्जिमा,कील,मुँहासे झाई का होम्योपैथिक उपचार

Homeopathic Medicine for Acne,Pimple,Eczema

homeopathic medicine for acne

एक्जीमा, कार्न, कील-मुहांसे, झाइयां आदि त्वचा के सामान्य रोग हैं। होमियोपैथिक फिलॉसफी के कारण यह रोग सोरा दोष के कारण होते हैं। यदि मनुष्य की प्रकृति में ‘सोरा’ दोष के तत्त्व नहीं होंगे, तो एक्जीमा होगा ही नहीं। वास्तव में ‘सोरा’ हमारी भौतिकवादी प्रवृत्ति एवं मानसिक और वैचारिक विषाक्तता का ही परिणाम है। वैसे भी ‘सोरा’ शब्द का उदभव ‘सोरेट’ से हुआ है जिसका हिंदी रूपान्तर ‘खुजली’ होता है।
एक्जीमा : इसे हिन्दी में अकौता, छाजन और पासा कहते हैं। यह रोग ज्यादातर पैर के टखनों के पास या पिण्डलियों में, जोड़ों में, कान के पीछे गर्दन पर, हाथों में और जननांग प्रदेश में होता पाया जाता है। वैसे, यह शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। इस रोग में तीव्र खुजली होती है। जननांग प्रदेश में इस रोग का होना सबसे ज्यादा कष्टदायक होता है।

एक्जिमा के कारण

यह रोग अनुचित आहार-विहार करने, अजीर्ण बने रहने, मांसाहार करने, डायबिटीज रोग होने और त्वचा को ज्यादा रगड़ लगने आदि कारणों से भी होता है।
• होमियोपैथिक फिलॉसफी के अनुसार ‘सोरा’ दोष का होना आवश्यक है।
• जीवाणुओं, फफूंद एवं परजीवी (जैसे साटकोप्ट्स-स्केबियाई) आदि सूक्षम जीवों द्वारा भी यह रोग होता है।

प्रकार

एक्जीमा मुख्यतः तीन प्रकार का होता है –
• सूखा एक्जीमा
• गीला यानी बहने वाला एक्जीमा
• स्थान विशेष पर होने वाला एक्जीमा

एक्जिमा के लक्षण एवं उपचार

सूखा एक्जीमा – सूखा एक्जीमा होने पर निम्नलिखित औषधियों में से,जिस औषधि के सर्वाधिक लक्षण रोगी में पाए जाएं, उस औषधि का सेवन रोगी को करना चाहिए।
एलुमिना : त्वचा का बेहद खुश्क, रूखा, सूखा और सख्त हो जाना, दरारें पड़ जाना और बेहद तेज खुजली होना और खुजाने पर फुसियां उठ आना विशेष लक्षण है। कब्ज रहना, बिस्तर में पहुंचकर गरमाई मिलने के बाद अत्यधिक खुजलाहट, सुबह उठने पर और गर्मी से परेशानी बढ़ना और खुली हवा में एवं ठंडे पानी से आराम मिलना आदि लक्षणों के आधार पर उक्त दवा 30 एवं 200 शक्ति में अत्यंत कारगर है।
रसवेनेनेटा : किसी भी प्रकार का खुश्क एक्जीमा, जिसमें त्वचा पर दाने की पुंसियां हों और तेज खुजली होती हो ,श्रेष्ठ दवा है। रात में अधिक खुजली, गर्म पानी से धोने पर आराम मिलना, त्वचा में लाली, त्वचा की ऊपरी सतह (एपिडर्मिस) में ‘वेसाइकिल’ बन जाना आदि लक्षणों के आधार पर 200 एवं 1000 शक्ति की दवा की दो-तीन खुराकें ही पर्याप्त होती हैं।
कैल्केरिया सल्फ : यह बच्चों के खुश्क एक्जीमा की उत्तम औषधिहै। सिर पर छोटी-छोटी पुंसियां हो जाएं, जिन्हें खुजाने पर खून निकलने लगे, मुख्य लक्षण हैं। 3 × से 12 x शक्ति की दवा फायदेमंद रहती है।
सल्फर : रोगी मैला और गंदा हो, शरीर से दुर्गध आती हो, फिर भी अपने को राजा महसूस करें, रोगी शरीर में गर्मी का अनुभव करता हो, पैरों में जलन होती हो, मीठा खाने की प्रबल इच्छा, अत्यधिक खुजली, किन्तु खुजाने पर आराम मिलता है और अधिक खुजाने पर खून निकलने लगे, बिस्तर की गर्मी से परेशानी बढ़ना, खड़े रहना दुष्कर, सुबह के वक्त अधिक परेशानी, किन्तु सूखे एवं गर्म मौसम में बेहतर महसूस करें। इन लक्षणों के आधार पर ‘सल्फर’ की 30 एवं 200 शक्ति की दवा की एक-दो खुराक ही चमत्कारिक असर दिखाती हैं। इस दवा के रोगी की एक अन्य विशेषता यह है कि शरीर के सारे छिद्र-यथा नाक, कान, गुदा अत्यधिक लाल रहते हैं, अत्यधिक खुजली एवं जलन रहती है। साथ ही पहले कभी एक्जीमा वगैरह होने पर अंग्रेजी दवाओं के लेप से उन्हें ठीक कर लेना और उसके बाद कोई अंदरूनी परेशानी लगातार महसूस करते रहना इसका मुख्य लक्षण है।

गीला एक्जीमा (वीपिंग एक्जीमा) –

ग्रेफाइटिस : गीले एक्जीमा को ठीक करने के लिए यह दवा बहुत कारगर रही है। अस्वस्थ त्वचा, जरा-से घाव से मवाद का स्राव, गाढ़ा, शहद जैसा मवाद, गर्मी में तथा रात के समय कष्ट बढ़ना, रगड़ने से दर्द होना, ग्रंथियों की सूजन, त्वचा अत्यंत खुश्क, खुश्की की वजह से स्तनों पर, हाथ-पैरों पर, गर्दन की त्वचा में दरारें पड़ जाना आदि लक्षणों के मिलने पर 30 शक्ति में एवं रोग अधिक पुराना हो, तो 200 शक्ति में अत्यंत लाभप्रद है।

स्थान विशेष का एक्जीमा –

पेट्रोलियम : स्थान विशेष पर बार-बार एक्जीमा हो, गीला, जलन, रात में अधिक खुजली, जरा-सी खरोंच लगने के बाद मवाद पड़ जाना, लाली, माथे पर, कानों के पीछे, अण्डकोषों की त्वचा पर, गुदा पर, हाथ-पैरों पर इस प्रकार का एक्जीमा होना एवं मुख्य बात यह है कि एक्जीमा के लक्षण जाड़े के मौसम में ही प्रकट होते हैं। सिर्फ इसी लक्षण के आधार पर ‘पेट्रोलियम’ 200 शक्ति में दी जाए, तो मरीज दो-तीन खुराक खाने के बाद ही ठीक हो जाता है।
मेजेरियम : यह सिर के एक्जीमा की खास औषधि है। सिर पर, हाथों पर, पैरों पर पपड़ी जमे एवं उसके नीचे से बदबूदार मवाद निकले, जिसमें कृमि हों, सिर पर बालों के गुच्छे बन जाएं, ‘वेसाइकिल’ बन जाएं, हड्डियां भी प्रभावित हों, छूने से एवं रात्रि में अधिक दर्द एवं खुजली, जलन, खुली हवा में आराम मिलने पर उक्त दवा की 5-6 खुराक 30 अथवा 200 शक्ति में फायदेमंद रहती है।
गोखरू या गट्टा (कार्न)
गोखरू की दवा
एण्टिमकूड : इस दवा का विशेष प्रभाव पैर के तलुओं पर होने वाले गोखरू या गट्टों पर पड़ता है। ज्यादातर गोखरू पैर के तलुओं में ही होते भी हैं। एण्टिमक्रूड इसकी श्रेष्ठ दवा है। साथ ही ‘रेन नकुलसबल्व’ उसे 30 शक्ति में लेनी चाहिए।
कील- मुहांसे : किशोरावस्था के अंत में और नवयुवावस्था के प्रारम्भ में शरीर में हारमोनल चेंज होता है, यौनांगों का विकास होता है, मन में यौन संबंधी भावना या उतेजना का अनुभव शुरू होता है। साथ ही पेट साफ न रहना, कब्ज रहना, शरीर की प्रकृति उष्ण होना, तले एवं खट्टे पदार्थों का अधिक सेवन आदि कारणों से चेहरे पर कील-मुहांसे निकलने लगते हैं। उचित दवा के चुनाव हेतु लक्षणों की समानता आवश्यक है।

कील मुँहासे का होमियोपैथिक उपचार

• जो मुहांसे छूने से दुखते हों और सारे चेहरे पर निकलते हों, जिनमें कील रहती हो, उनके लिए ‘हिपर सल्फ’ 200 शक्ति की दवा सप्ताह में एक बार तीन खुराक एवं अगले दिन में ‘गन पाउडर’ दवा 3 × से 12 x तक शक्ति में लेनी चाहिए।
• जिनके मुहांसे पुराने हों, उनके लिए ‘कालीब्रोम’ 30 शक्ति में युवक एवं युवतियों – दोनों के लिए उपयोगी है। साथ ही ‘पिकरिक एसिड’ 30 शक्ति में एवं ‘कैल्केरिया फॉस’ 30 शक्ति में कारगर है।
• जो मुहांसे कड़े व गांठदार होते हैं, उनके लिए ‘कार्बो एनीमेलिस’ दवा 30 शक्ति में अधिक कारगर है।
• युवतियों के चेहरे पर लाल रंग के मुहांसे हो जाते हैं। इसके लिए ‘कैल्केरियाफॉस’ 30 शक्ति में एक दिन छोड़कर तीन-तीन खुराक लेने पर फायदा मिलता है।
• जिन युवतियों को मासिक ऋतु स्राव कम होता हो, उनके लिए ‘पल्सेटिला’ दवा 30 शक्ति में उत्तम असरकारक है।
• साथ ही ‘बरबेरिस एक्विफोलियम’ दवा का मूल अर्क 5-5 बूंद दो चम्मच पानी में घोलकर सुबह-शाम पीने एवं इसे ही मुहांसों पर लगाने से (रूई से भिगोकर), मुहांसे ठीक होते हैं, त्वचा का रंग गोरा होता है और चेहरा सुन्दर रहता है।
• लाल दाने कड़े हो गये हों तो रेडियम ब्रोमाइड-30 लेनी चाहिए।
• पुराने, क्रमबद्ध मुंहासों को हटाने के लिए अर्निका 200 लें।
• यदि मुंहासों के दाग पड़ गए हों, तो उष्ण प्रकृति के बच्चों के लिए ‘एसिड फ्लोर’ 200 शक्ति में एवं शीतल प्रकृति वालों के लिए ‘साइलेशिया’ 200 शक्ति में कुछ खुराक लेना ही असरकारक है।

झाइयां का होमियोपैथिक इलाज

कुछ स्त्री-पुरुषों की नाक की नोक पर व आंखों के नीचे झाइयों पड़ जाती हैं। ऐसा प्राय: रक्ताल्पता, पेट व लिवर में खराबी और गर्भाशय में दोष होने के कारण होता है। इसके लिए ‘सीपिया’ दवा 200 शक्ति में दो-तीन खुराक हर तीसरे दिन लेनी चाहिए। गर्भाशय में दोष हो, तो ‘एक्टिया रेसीमोसा’ 200 शक्ति में हर तीसरे दिन लेनी चाहिए। ‘फेरमफॉस’ 6 x एवं ‘काली सल्फ’ 6 x की 6-6 गोलियां सुबह-शाम खाएं एवं इन्हें ही पीसकर चेहरे पर लगाएं व थोड़ी देर बाद धोएं पाचन-क्रिया को ठीक रखें खान-पान का विशेष खयाल रखें।
• गर्मियों में बच्चों के फोड़े-पुंसियां बहुत निकलते हों, तो गर्मियां प्रारम्भ होने से कुछ पूर्व ही ‘साइलेशिया’ औषधि 200 शक्ति में सप्ताह में एक बार तीन खुराक खिलाना पर्याप्त रहता है। साथ ही ‘कालीबाई’ औषधि 30 शक्ति में खिलानी चाहिए। पंद्रह दिन से एक माह तक औषधि सेवन करने से आशातीत लाभ मिलता है।
लाभदायक होमियोपैथिक टिप्स
• पलकों का प्रदाह, सूजन, पलक पर अंजनी एवं उसमें मवाद हो तो – हिपर सल्फ
• नाक की हड्डी का घाव, मुंह के घाव के लिए उपयोगी – हाइड्रेस्टिस
• नाक में घाव, घाव हड्डी तक चला जाना, हड्डी में छेद हो जाना – ओरम मेट
•. युस्टेकियन ट्यूब में पुराना मवाद, मध्य कान में गांठे, सर-सर जैसी आवाज सुनना एवं किसी कारण से बहरा हो जाने की स्थिति में – आयोडियम

त्वचा के रोगों के लिए होमियोपैथी औषधि

Homeopathic Medicine For Skin Problems


त्वचा पर उत्पन्न किसी भी प्रकार के रोग शरीर के अन्दर मौजूद रोग को बताता है। अत: त्वचा के रोगों में केवल बाहरी दवाईयों का प्रयोग करके त्वचा को स्वस्थ नहीं बनाया जा सकता है बल्कि त्वचा को स्वस्थ बनाने के लिए आंतरिक दवाईयों का प्रयोग करना लाभदायक होता है। इसका कारण यह है कि जब शरीर के अन्दर का कोई अंग रोगग्रस्त हो जाता है तो उस अंगों की प्रतिक्रिया त्वचा के द्वारा होती है और जब रोग को दूर करने के लिए आंतरिक औषधियों का प्रयोग किया जाता है तो अन्दर का रोगग्रस्त अंग ठीक हो जाता है जिससे त्वचा अपने आप स्वस्थ हो जाती है। लेकिन त्वचा की कुछ ऐसे भी रोग हैं जिनका सम्बंध अन्दर के अंगों से नहीं होता बल्कि त्वचा से ही होता है जिसके लिए लगाने वाले औषधियों का प्रयोग करने से रोग ठीक हो जाता है। त्वचा पर बाहरी प्रयोग में आने वाली औषधियां हैं जिंक-आयण्टमेण्ट, कैलेण्डुला सिरेट, सल्फर, गुलार्डज-साल्यूशन या वैसलीन आदि। इन औषधियों के प्रयोग से त्वचा के ऊपरी भाग के रोग ठीक हो जाते हैं लेकिन त्वचा के अन्दुरूनी भाग तक फैलने वाले रोग ठीक नहीं हो पाते हैं। त्वचा पर उत्पन्न होने वाले रोग है कुछ इस प्रकार हैं- फंगल का संक्रमण, जूएं, एक्जिमा, सोरायसिस, रूसी, जीवाणुओं का संक्रमण, छोटी-माता, खसरा, स्केबीज या हर्पिस आदि।

त्वचा रोग के कारण :- त्वचा पर उत्पन्न रोगों के कई कारण हैं जैसे- गन्दे व मैले कपड़े का प्रयोग करना, गन्दी जगहों पर रहना, रसायन चीजों का प्रयोग करना, मेकप अधिक करना, रंगों का प्रयोग करना, परफ्यूम लगना, साबुन व डिटरजेन्ट का इस्तेमाल करना, एलर्जी वाले चीजों के सम्पर्क में आना और खुजली होना आदि। त्वचा के रोग मछली एवं बैंगन खाने से भी हो जाता है।

विभिन्न औषधियों से उपचार:

1. आर्सेनिक- पेट, आतों एवं किडनी के रोगों में त्वचा का रोग होने पर इस औषधि की निम्न शक्ति का प्रयोग किया जाता है एवं दर्द एवं मानसिक रोगी को त्वचा रोग होने पर इस औषधि की उच्च शक्ति का प्रयोग किया जाता है। यदि रोग केवल त्वचा के ऊपरी भाग पर हो तो 2x या 3x मात्रा का प्रयोग किया जा सकता है। इस औषधि का प्रयोग त्वचा के ऊन सभी रोग में लाभकारी है जिसमें त्वचा मोटी हो जाती है जैसे- सोरियासिस, पुराने एक्जिमा, पुराने पित्ती का रोग आदि। त्वचा पर खुजली होने पर भी इस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
त्वचा पर दाने होना, जख्म होना, बदबूदार स्राव होना, पुराने एक्जिमा, खुजली व जलन आदि त्वचा के रोग में आर्सेनिक औषधि की 3, 30 या 200 शक्ति का प्रयोग किया जाता है। मछली खाने से त्वचा पर खुजली व जलन वाले दाने उभर आए हो या दाने पूर्ण रूप से निकले बिना ही बैठ गया हों जिससे रोगी को कष्ट होता हो तो इस औषधि का प्रयोग अत्यंत ही हितकारी होता है। त्वचा पर उत्पन्न पीब वाले दाले जिस पर खुरण्ड बन जाए। बेकार, ग्रोसर एवं हाथ के पिछले भाग पर खुजली होने पर आर्सेनिक औषधि के स्थान पर बोविल्टा औषधि का उपयोग किया जा सकता है। त्वचा पर से पपड़ी झड़ने एवं दाद होने पर सीपिया औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। अगर त्वचा में सूजन होने के साथ वह लाल हो जाए और उस पर छाले पड़ जाए तो रस टॉक्स औषधि का प्रयोग करना लाभप्रद होता है। यदि त्वचा में दुखन (रवनेस्स) हो और धोने या पानी लगने से दर्द बढ़ जाए तो क्लेमेटिस औषधि का प्रयोग करें। रिसने वाले दाने होने पर भी क्लेमेटिस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
2. ग्रैफाइटिस- त्वचा पर होने वाले अनेक प्रकार के रोगों के लिए यह औषधि अत्यंत लाभकारी है। त्वचा पर उत्पन्न विभिन्न लक्षणों जैसे- सिर, चेहरे व जोड़ों के बीच एवं कान के पीछे पतले स्राव वाले या छिलकेदार दाने होना। मुख व आंखों के कोने फट जाना और उससे खून निकलना, गोंद की तरह स्राव होना या शहद की तरह स्राव होना, गाढ़ा, तारदार, चिपटने वाला स्राव होना। त्वचा पर उत्पन्न एक्जिमा रोग जिसमें दरारें पड़ जाती हैं और खुजली होती है। त्वचा खुश्क एवं कड़ी हो जाती है। बाल भी कड़े होते हैं एवं झड़ते हैं। इस तरह त्वचा पर उत्पन्न लक्षणों में ग्रैफाइटिस औषधि की 6 या 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है। यदि त्वचा पर सूखी व पपड़ी बनने वाले दाने हो तो लाइकोपोडियम का प्रयोग किया जाता है। खोपड़ी पर होने वाले ऐसे एक्जिमा जो धीरे-धीरे चेहरे तक फैल जाता है, सुबह के समय उस पर खुजली होती है और त्वचा की पपड़ी सफेद होती है। ऐसे एक्जिमा को दूर करने के लिए कैलकेरिया कार्ब का प्रयोग किया जाता है।
3. सल्फर:-त्वचा पर उत्पन्न होने वाली कितनी भी तेज खुजली हो तो उसे दूर करने के लिए सल्फर औषधि का उपयोग किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त त्वचा के अन्य रोग जैसे- बालों की जड़ों में दाने या फुन्सियां होना जिस पर खुरण्ड जम जाता है। सिर पर खुश्की, गर्मी व तेज खुजली होती है जो रात को बढ़ जाती है, खुजलाने खुजली में खुजलाने से त्वचा तेज जलन होती है एवं नहाने से कष्ट बढ़ जाता है। ऐसे लक्षणों में भी सल्फर औषधि का प्रयोग किया जाता है।
त्वचा के अन्दर की खुजली एवं गिट्टे के जोड़ों की खुजली में सेलेनियम औषधि देना हितकारी होता है। एक्जिमा के दाने यदि किसी बाल वाले अंग पर हुआ हो तो वहां के बाल झड़ने लगते हैं। ऐसे एक्जिमा को ठीक करने के लिए भी सेलेनियम औषधि का ही प्रयोग करना बेहतर होता है।
4. ऐन्टिम क्रूड
त्वचा पर मोटे मोटे दाने हो गए हो, नाखून न बढ़ते हों, बच्चों के सिर पर शहद के रंग का खुरण्ड पड़ गया हो, नाक के नकुरे एवं मुख के कोने फट गए हों तो ऐसे लक्षणों में ऐन्टिम क्रूड औषधि की 3 या 6 शक्ति का प्रयोग करना हितकारी होता है।
यदि कोई रोगी चेचक रोग से पीड़ित हो और चेचक समाप्त होने के बाद उसके दानों के दाग पड़ गए हों तो उसे ऐन्टिम टार्ट औषधि का सेवन कराना चाहिए। अण्डकोष की थैली की सूजन और उसमें पीब बनने के लक्षणों में भी इस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
5. थूजा:-मस्सों होने या एक्जिमा हो जाने पर इस औषधि के प्रयोग से रोग ठीक होता है। चेहरे पर दाने होने पर थूजा औषधि की 30 या 200 शक्ति का सेवन करने से लाभ होता है।
टीक लगवाने के बाद अगर त्वचा पर किसी प्रकार के दाने या अन्य रोग दिखाई दें तो थूजा औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करने से लाभ होता है।
6. बैसिलिनम- यक्ष्मा (टी.बी.) या गण्डमाला रोग से ग्रस्त रोगी को त्वचा रोग हो गया हो तो बैसिलिनम औषधि की 200 शक्ति का उपयोग करना हितकारी होता है।
7. बेलिस पेरोनिस- नम हवा लगने या अचानक मौसम परिवर्तन होने के कारण यदि त्वचा का कोई रोग हो गया हो तो बेलिस पेरोनिस औषधि का प्रयोग करें।
8. नैट्रम म्यूर- नाखून का वह भाग जो मांस से जुड़ा होता है यदि उस स्थान पर सूजन आ जाए तो रोगी को नैट्रम म्यूर औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। जोड़ों के मोड़ों में पानी वाले छाले होने, होंठों पर पनीला छाले होना, बुखार में पनीले छाले होना आदि रोग में इस
है।
औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है। बिना खुजली वाले तर एक्जिमा होने या ऐसे एक्जिमा जिसमें खुरण्ड पड़ जाते हैं और उसके नीचे से गाढ़ा पीब का स्राव होता रहता है। पित्ती उछलना व खुजली आदि। इन सभी त्वचा के रोगों में नैट्रम म्यूर औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
9. क्रियोसोट- जोड़ों के पास कि वह पेशियां जो जोड़ को फैलाने में मदद करती है उस पर दाने होने पर क्रियोसोट औषधि की 3, 30 या 200 शक्ति का सेवन करना लाभकारी होता है।
10. बरबरिस- चेहरे पर दाने या फुन्सियां आदि को दूर करने के लिए बरबरिस औषधि का प्रयोग किया जाता है। इस रोग में इस औषधि के मूलार्क को 40 से 50 बूंद की मात्रा में प्रयोग करने से चेहरा साफ व सुन्दर होता है।
11. आर्निका- चोट लगने या गिर जाने के बाद त्वचा का कोई रोग होने पर आर्निका औषधि की 3 या 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
12. हाइड्रोकोटाइल- त्वचा अत्यंत सूखी होती है जिसके कारण त्वचा से पपड़ियां उतरती रहती है। ऐसे त्वचा रोग में हाइड्रोकोटाइल औषधि की 1 या 6 शक्ति का सेवन करना लाभकारी होता है। कुष्ठ रोग होने एवं सोरियासिस रोग में भी इस औषधि का प्रयोग लाभदायक होता है लेकिन सोरियासिस रोग में बोरैक्स औषधि का भी प्रयोग करना अत्यंत उपयोगी होता है।
13. पेट्रोलियम- यदि एक्जिमा वाले भाग पर मोटा खुरण्ड जम गया हो और उसके नीचे से पीब का स्राव होता हो, त्वचा फट गई हो, त्वचा कठोर व सूख गई हो, अंगुलियों के अगले भाग एवं हाथों की त्वचा फट गई हो या कानों के पीछे एक्जिमा हो गया हो तो इन सभी त्वचा रोगों में पेट्रोलियम औषधि की 12x, 3, 30 या 200 शक्ति का प्रयोग करना उपयोगी होता है।
14. मेजेरियम:-यदि सिर पर वसा ग्रंथियों के स्राव के कारण सफेद पपड़ियां जम गई हो तो मेजेरियम औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है। सिर पर तेज खुजली होती हो जो टोपी पहनने व गर्मी से और बढ़ जाती है। त्वचा पर होने वाले छाले या दाने जिससे स्राव होने पर वह जमकर पपड़ी बन जाती है और फिर उसके नीचे से लगने वाली पीब निकलती रहती है। नर्व के रास्ते पर स्नायविक दर्द होता है जैसे हरपिज रोग होता है। फफून्दी लगने से खोपड़ी पर या कानों के पीछे खुजली होती है जो रात को बढ़ जाती है जिससे रोगी को ठीक से नींद नहीं आती। इस तरह त्वचा पर उत्पन्न होने वाले सभी रोगों के लिए मेजेरियम औषधि की 6 या 30 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
एक्जिमा आदि त्वचा का रोग जो मौसम परिवर्तन के कारण व सर्दी के मौसम में उत्पन्न होता है और गर्मियों के मौसम में समाप्त हो जाता है। ऐसे लक्षणों में मेजेरियम औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।

Tuesday, 28 April 2020


राजयोग मेडिटेशन कोर्स तीसरा दिन-   



                                                                      राजयोग मेडिटेशन कोर्स तीसरा दिन
==================================="राजयोग का आधार तथा विधि"===========================
सम्पूर्ण स्थिति को प्राप्त करने के लिए और शीघ्र ही आध्यात्म में उन्नति प्राप्त करने के लिए मनुष्य को  राजयोग के निरंतर अभ्यास की आवश्यकता है, अर्थात चलते फिरते और कार्य-व्यवहार करते हुए भी परमात्मा की स्मृति में स्थित होने को जरुरत है I
यद्यपि निरंतर योग के बहुत लाभ हैं I और निरंतर योग द्वारा ही मनुष्य सर्वोत्तम अवस्था को प्राप्त कर सकता है I तथापि विशेष रूप से योग में बैठना आवश्यक है I इसीलिए चित्र में दिखाया गया है कि परमात्मा को याद करते समय हमे अपनी बुद्धि सब तरफ से हटाकर एक जोतिर्बिंदु परमात्मा शिव से जुटानी चाहिए। मन चंचल होने के कारण काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार अथवा शास्त्र और गुरुओ की तरफ भागता है I लेकिन अभ्यास के द्वारा हमें इसको एक परमात्मा की याद में ही स्थित करना है I अत: देह सहित  देह के सर्व-सम्बन्धों को भूल कर आत्म-स्वरूप में स्थित होकर, बुद्धि में ज्योतिर्बिंदु परमात्मा शिव की स्नेहयुक्त स्मृति में रहना ही वास्तविक योग है, जैसा की चित्र में दिखलाया गया है I
कई मनुष्य योग को बहुत कठिन समझते है, वे कई प्रकार की हाथ क्रियाएं तप अथवा प्राणायाम करते रहते हैं I
वास्तव में "योग" अति सहज है जिस प्रकार एक बच्चे को अपने देहधारी पिता की सहज और स्वत: याद रहती है। वैसे ही आत्मा को अपने पिता परमात्मा की याद स्वत: और सहज होनी चाहिए।
इस अभ्यास के लिए यह सोचना चाहिए कि- "मैं एक आत्मा हूँ, मैं ज्योति -बिंदु परमात्मा शिव की अविनाशी संतान हूँ,जो परमपिता ब्रह्मलोक के वासी है, शांति के सागर, आनंद के सागर प्रेम के सागर और सर्वशक्तिमान है --I" ऐसा मनन करते हुए मन को ब्रह्मलोक में परमपिता परमात्मा शिव पर स्थित करना चाहिए और परमात्मा के दिव्य-गुणों और कर्तव्यो का ध्यान करना चाहिए I
जब मन इस प्रकार की स्मृति में स्थित होगा I तब सांसारिक🎎 संबंधो अथवा वस्तुओं का आकर्षण अनुभव नहीं होगा। जितना ही परमात्मा द्वारा सिखाये गये ज्ञान में निश्चय होगा, उतना ही सांसारिक विचार और लौकिक संबंधियों की याद मन में नही आयेगी I और उतना ही अपने स्वरूप का परमप्रिय परमात्मा के गुणों का अनुभव होगा I
आज बहुत से लोग कहते है कि हमारा मन परमात्मा कि स्मृति में नही टिकता अथवा हमारा योग नही लगता इसका एक कारण तो यह है कि वे "आत्म-निश्चय" में स्थित नही होते आप जानते है कि जब बिजली के दो तारो को जोड़ना होता है तब उनके ऊपर के रबड़ को हटाना पड़ता है, तभी उनमे करंट आता है इसी प्रकार, यदि कोई निज देह के भान में होगा तो उसे भी अव्यक्त अनुभूति नही होगी, उसके मन की तार परमात्मा से नही जुड़ सकती I
दूसरी बात यह है कि वे तो परमात्मा को नाम-रूप से न्यारा व् सर्वव्यापक मानते है, अत: वे मन को कोई ठिकाना भी नही दे सकते I परन्तु अब तो यह स्पष्ट किया गया है कि परमात्मा का दिव्य-नाम शिव, दिव्य-रूप ज्योति-बिंदु और दिव्यधाम परमधाम अथवा ब्रह्मलोक है अत: वहा मन को टिकाया जा सकता है I
तीसरी बात यह है कि उन्हें परमात्मा के साथ अपने घनिष्ठ सम्बन्ध का भी परिचय नही है, इसी कारण परमात्मा के प्रति उनके मन में घनिष्ठ स्नेह नही अब यह ज्ञान हो जाने पर हमे ब्रह्मलोक के वासी परमप्रिय परमपिता शिव-ज्योती-बिंदु कि स्मृति में रहना चाहिए I

डॉ.मनोज कुमार शर्मा


======================"राजयोग की यात्रास्वर्ग की और दौड़"===========================
"राजयोग की यात्रास्वर्ग की ओर दौड़" "राजयोग के निरंतर अभ्यास से मनुष्य को अनेक प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त होती है | इन शक्तियों के द्वारा ही मनुष्य सांसारिक रुकावटों को पार करता हुआ आध्यात्मिक मार्ग की ओर अग्रसर होता है | आज मनुष्य अनेक प्रकार के रोग, शोक, चिन्ता और परेशानियों से ग्रसित है और यह सृष्टि ही घोर नरक बन गई है | इससे निकलकर स्वर्ग में जाना हर एक प्राणी चाहता है,लेकिन नरक से स्वर्ग की ओर का मार्ग कई रुकावटों से युक्त है | काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार उसके रास्ते में मुख्य बाधा डालते है | पुरुषोतम संगम युग में ज्ञान सागर परमात्मा शिव जो सहज राजयोग की शिक्षा प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा दे रहे है, उसे धारण करने से ही मनुष्य इन प्रबल शत्रुओं (5 विकारों) को जीत सकता है |
चित्र में दिखाया है कि नरक से स्वर्ग में जाने के लिए पहले-पहले मनुष्य को काम विकार की ऊंची दीवार को पार करना पड़ता है।जिसमे नुकीले शीशों की बाढ़ लगी हुई है | उसको पार करने में कई व्यक्ति देह-अभिमान के कारण से सफलता नहीं पा सकते है और इसीलिए नुकीलें शीशों पर गिरकर लहू-लुहान हो जाते है | विकारी दृष्टी, कृति, वृति ही मनुष्य को इस दीवार को पार नहीं करने देती | अत: पवित्र दृष्टी (Civil Eye) बनाना इन विकारों को जीतने के लिए अति आवश्यक है |
दूसरा भयंकर विघ्न क्रोध रूपी अग्नि-चक्र है | क्रोध के वश होकर मनुष्य सत्य और असत्य की पहचान भी नहीं कर पाता है और साथ ही उसमे ईर्ष्या, द्वेष, घृणा आदि विकारों का समावेश हो जाता है जिसकी अग्नि में वह स्वयं तो जलता ही है साथ में अन्य मनुष्यों को भी जलाता है | इस बाधा को पार करने के लिएस्वधर्ममें अर्थातमैं आत्मा शांत स्वरूप हूँ’ – इस स्थिति में स्थित होना अत्यावश्यक है |
लोभ भी मनुष्य को उसके सत्य पथ से हटाने के लिए मार्ग में खड़ा है | लोभी मनुष्य को कभी भी शान्ति नहीं मिल सकती और वह मन को परमात्मा की याद में नहीं टिका सकता | अत: स्वर्ग की प्राप्ति के लिए मनुष्य को धन खजाने के लालच और सोने की चमक के आकर्षण पर भी जीत पानी है |
मोह भी एक ऐसी बाधा है जो जाल की तरह खड़ी रहती है | मनुष्य मोह के कड़े बन्धन-वश, अपने धर्म कार्य को भूल जाता है और पुरुषार्थ हींन बन जाता है | तभी गीता में भगवान ने कहा है किनष्टोमोहा स्मृतिर्लब्धा:’ बनो, अर्थात देह सहित देह के सर्व सम्बन्धों के मोह-जाल से निकल कर परमात्मा की याद में स्थित हो जाओ और अपने कर्तव्य को करो, इससे ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकेगी | इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्यात्मा मोह के बन्धनों से मुक्ति पाए, तभी माया के बन्धनों से छुटकारा मिलेगा और स्वर्ग की प्राप्ति होगी|
अंहकार भी मनुष्य की उन्नति के मार्ग में पहाड़ की तरह रुकावट डालता है | अहंकारी मनुष्य कभी भी परमात्मा के निकट नहीं पहुँच सकता है | अहंकार के वश ,मनुष्य पहाड़ की ऊंची चोटी से गिरने के समान चकनाचूर हो जाता है| अत: स्वर्ग में जाने के लिए अहंकार को भी जीतना आवश्यक है| अत: याद रहे कि इन विकारों पर विजय प्राप्त करके मनुष्य से देवता बनने वाले ही  🎎नर-नारी स्वर्ग में जा सकते है, वरना हर एक व्यक्ति के मरने के बाद जो यह लिख दिया जाता है किवह स्वर्गवासी हुआ’, यह सरासर गलत है| यदि हर कोई मरने के बाद स्वर्ग जा रहा होता तो जन-संख्या कम हो जाती और स्वर्ग में भीड़ लग जाती और मृतक के सम्बन्धी मातम करते।
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I am DR.MK.SHARMA full name Dr.Manoj Kumar Sharma,Registered Homeopathic Consulting Physician,BHMS.I complete my degree in 2010.Mission is to spread awareness about Holistic Health and an ecological sustainable compassionate lifestyle.

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