Monday, 27 April 2020


 राजयोग मेडिटेशन कोर्स ७ दिवसीय 

 Rajyoga Meditation Course


                                    आप सभी का 7 दिवसीय राजयोग कोर्स के पहले दिन में स्वागत है। 
                                             
Dr.manoj kumar Sharma Spiritual healing
Rajyoga Meditation Course 


Dr.Manoj Kumar Sharma,Spiritual Healing
Rajyoga Meditation
                                                                            🌟आत्मा का परिचय🌟 
                                                                             ( पहले दिन का कोर्स)
आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजें तो बना डाली हैं, उसने संसार की अनेक पहेलियों का उत्तर भी जान लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओं का हल ढूँढने में खूब लगा हुआ है, परन्तुमैंकहने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता।
                                                                           WHO AM I ???? मैं कौन हूँ ???
आज किसी मनुष्य से पूछा जाये कि- “आप कौन है ?” तो वह झट अपने शरीर का नाम , व्यवसाय, पद, जाति, धर्म, देश आदि द्वारा अपना परिचय बताता है। लेकिन यह तो जन्म के पश्चात प्राप्त हुई पहचान (Acquired Personality) है।
आध्यात्मिकता (आत्मा + अध्ययन) ही हमें इसका ज्ञान कराती है। जिस प्रकार एक उपकरण को चलाने हेतु ऊर्जा (बिजली) की आवश्यकता होती, उसी प्रकार शरीर को चलाने हेतु आत्मा रूपी ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
मैं कहने वाली आत्मा है कि शरीर, मैं आत्मा हूँ और ये मेरा शरीर। मैं शब्द आत्मा की तरफ और मेरा शब्द शरीर की तरफ इशारा करते हैं। हम कहते हैं मेरा शरीर, मेरे हाथ, इससे साबित होता है कि मेरा शब्द कहने वाली आत्मा अलग है।
आत्मा और शरीर का सम्बन्ध ड्राईवर और मोटर के समान है जैसे मोटर में बैठकर ड्राईवर उसे चलाता है। वैसे ही आत्मा शरीर में रहकर उसका संचालन करती है और शरीर से अलग अस्तित्व रखती है।
गीता में आत्मा शरीर को
पुरुष + प्रकृति
रथी + रथ
क्षेत्रज्ञ + क्षेत्र
के नाम से वर्णित किया गया है।
मनुष्य को Human being कहते अर्थात
Humas (मिट्टी, शरीर) + being (आत्मा)
I + MY : मैं आत्मा + मेरा शरीर
यहाँ आप मनुष्य संरचना के स्थूल सूक्ष्म तत्व को समझेंगे।
शरीर की संरचना 5 स्थूल तत्व जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश से है।
उदाहरण :-
"क्षिति जल पावक गगन समीरा।"
"पंच तत्व मिल बना शरीरा।"
आत्मा की संरचना के 7 सूक्ष्म तत्व :
पवित्रता, प्रेम, शांति, सुख, ज्ञान, आनन्द और शक्ति है।
उदाहरण :-
कबीर जी भजन
"पंच तत्व की बनी चदरिया,
सात तत्व की पूनी "
" नौ दस मास बुनन में लागे ,
मूरख मैली कीन्ही "
चदरिया झीनी रे झीनी......

                                              आत्मा के मुख्य 3 अंग इस प्रकार हैं :
                               मन - बुद्धि - संस्कार
आत्मा एक सूक्ष्म पॉइंट ऑफ़ लाइट है। उस पर कोई भी भौतिक शक्ति प्रभाव नहीं डाल सकती। जिस तरह शरीर को कर्मेन्द्रियाँ हैं, उसी तरह आत्मा की भी तीन सूक्ष्म इन्द्रियाँ हैं मन, बुद्धि और संस्कार।
जैसे परमाणु में सूक्ष्म Electron, Neutron और Proton होते हैं उसी प्रकार आत्मा में सूक्ष्म मन, बुद्धि और संस्कार होते हैं।
मन (mind) - सकारात्मक नकारात्मक विचार उत्पन्न करना।
बुद्धि (intellect) - सकारात्मक नकारात्मक निर्णय लेना।
संस्कार (resolves) - सकारात्मक नकारात्मक कार्यों की पुनरावृत्ति करना।
जिस प्रकार Electric Energy भौतिक ऊर्जा का स्रोत है उसी प्रकार Eternal Energy (आत्मा) Spiritual Energy का स्रोत है।
Electric Energy में तीन शक्तियाँ होती हैं।
1) Magnetic power
2) Vibration power
3) Radiation power
ठीक उसी प्रकार आत्मा में भी ये तीनों शक्तियां होती हैं। जिसके प्रति हम संकल्प करते उसको आकर्षित करते, संकल्प तरंगो द्वारा उस तक पहुंचते भी हैं, विकिरण शक्ति द्वारा संकल्पो को एकाग्र कर उस व्यक्ति के मनोदशा को बदल भी सकते, उसकी बीमारी को भी ठीक कर सकते हैं।
मन - यह आत्मा की विचार शक्ति है मन की शक्ति के द्वारा ही आत्मा सोचती है। मन की गति आवाज की गति से भी तीव्र है।
मन और हृदय में अन्तर है क्योंकि हृदय शरीर का भौतिक अंग है जो रक्त संचारण को बनाये रखता है परंतु मन तो आत्मा की शक्ति है।
बुद्धि - यह आत्मा की तर्क और परखने की शक्ति है इसका कार्य है समझना, निर्णय लेना, तर्क करना।
बुद्धि और मस्तिष्क में भी अन्तर है क्योंकि मस्तिष्क शरीर के नियंत्रण कक्ष के रूप में है लेकिन बुद्धि आत्मा की निर्णायक शक्ति है।
संस्कार :- यह आत्मा के किये हुए कर्मो का प्रभाव है जो आत्मा अपने साथ अगले जन्म में ले जाती है इसके आधार पर ही फिर मन में संकल्प उत्पन्न होते हैं। आत्मा प्रकाश और शक्ति से युक्त एक पॉइंट ऑफ़ लाइट है। भृकुटि में निवास करती है।
संस्कार के बारे में उदाहरण
दो Identical twins के संस्कार भी समान नही होते हैं। उन्हें गर्भ में भी एक जैसा ही वातावरण मिलता है। उनका nutrition भी same placenta से होता है। घर में भी उन्हें एक जैसी ही पालना मिलती है। फिर भी उनका संस्कार अलग क्यों होता है ? क्योंकि वो पिछले जन्म के अपने संस्कार साथ लेकर आते है।
संस्कार के मुख्यतः पाँच प्रकार हैं।
1. अनादि संस्कार :- आत्मा के ओरिजिनल संस्कार। पवित्रता, प्रेम, शांति, सुख, आनंद, ज्ञान शक्ति।
2. खानदानी संस्कार
3. संग वातावरण के संस्कार
4. पूर्व जन्म के संस्कार
5. दृढ़ता (Will power) के संस्कार
शरीर के मुख्य अंगों का वर्णन इस प्रकार है। शरीर के मुख्य 5 अंग हैं :-
आँख, नाक, कान, मुख, हाथ - पैर। जिनके द्वारा हम देखने, सुनने, सोचने, बोलने, खाने, कर्म करने आदि कार्य करते हैं।
मैं आँख, कान और मुँह नहीं हूँ। मैं आँख द्वारा देखने वाली, कान द्वारा सुनने वाली और मुख द्वारा बोलने वाली मालिक आत्मा हूँ।
उदाहरण के लिए:-
जैसे मोबाइल में एक छोटी-सी चिप में ही सब कुछ समाया होता है। जितना भरना चाहो उतना भर सकते है। इसमें हम बहुत कुछ भर सकते है। फ़ोटो, ऑडियो, वीडियो, टेक्स्ट.. और जब चाहे तब उसे देख और सुन सकते है। ठीक वैसे ही हमारे शरीर को चलाने वाली चिप, शक्ति को आत्मा कहा जाता है।
जैसे हरेक चिप की क्षमता अलग होती है वैसे हरेक आत्मा का पार्ट अलग- अलग होता है। हरेक आत्मा अधिकतम 84 और कम से कम 1 जन्म लेती है।
मोबाइल ख़राब हो जाने पर भी चिप के contents तो उसमें रहते हैं और मोबाइल की चिप को निकाल कर दूसरे मोबाइल में डालते हैं तो वह सब फिर से देख और सुन सकते हैं जो चिप में आलरेडी हैं। वैसे ही जब शरीर छूट जाता है तब आत्मा उससे निकल कर दूसरा शरीर लेती है।
आत्मा को साबित करना वैसे ही है जैसे आप जिस हवा में श्वास ले रहे हो उस हवा को साबित करना। जबकि वह दिखती नहीं लेकिन महसूस होती है। इसी तरह आत्मा दिखती नही है लेकिन साक्षी होकर देखिए तो महसूस होती है।
✦✦ कैसे साबित करें कि आत्मा 7 गुणों से युक्त है?
जिस प्रकार शरीर 5 तत्वों से मिलकर बना है। पानी की कमी होने से प्यास लगती है। पानी की जगह घी, तेल या अन्य कोई तरल पदार्थ नहीं ले सकते। ऑक्सीजन की कमी से श्वांस बंद हो जाता है। उसकी जगह एथेन, मेथेन गैस नहीं ले सकते। पृथ्वी तत्व की कमी से भूख लगती है। वैसे ही जो वस्तु जिन पदार्थों या घटकों से बनी है, उसकी पूर्ति के लिए उन्हीं पदार्थों या घटकों की माँग करती है।
उसी प्रकार आत्मा में जब पवित्रता, प्रेम, शांति, सुख, आनंद, ज्ञान, शक्ति की कमी होने लगती है तो वह उनकी मांग करने लगती है। इससे सिद्ध होता है कि आत्मा उन सभी गुणों से मिलकर बनी है, गुणों से युक्त है।
*आत्मा का स्वरूप :-*
आत्मा एक अति सूक्ष्म दिव्य ज्योति बिंदु रूप है। इसलिए व्यक्ति जब शरीर छोड़ता है तो दीपक जलाते हैं अर्थात शरीर में स्थित चेतन्य ज्योति के यादगार स्वरूप ज्योति जगाते हैं। तभी लोग कहते हैं वह चैतन्य ज्योति चली गई। (The light of the life has gone.) आत्मा एक चमकते हुए सितारे के समान है। एक प्रकाश पुंज है। अलग-अलग धर्म ग्रन्थों में भी आत्मा के स्वरुप के विषय में बताया गया है उसके बारे में चर्चा करते हैं :-
श्वेताश्वतर उपनिषद् 5/9 में कहा गया
"बालाग्रशत भागस्य शतधाकल्पि तस्य "
अर्थात :- मनुष्य के सिर के बाल के ऊपरी हिस्से को 100 भागों में बांट दिया जाए, फिर प्रत्येक भाग के 100 हिस्से कर दिए जाएं फिर जो माप आएगा, असल में आत्मा का वही आकार होता है अर्थात आत्मा का जो आकार है वह सूक्ष्माति सूक्ष्म है।
मुंडकोपनिषद् 3/1/9 में कहा गया "एषोणुरात्मा चेतसा वेदितव्य: "
अर्थात:- आत्मा का आकार एक अणु जितना होता है।
आर्यसमाजी भी आत्मा को अणु मानते हैं, विभु नहीं।
गरुड़ पुराण के अनुसार ही आत्मा का आकार अंगुष्ठ आकार से बड़ा नहीं है।
इसके अलावा अन्य ग्रंथों और पुराणों में भी आत्मा की व्याख्या सूक्ष्म से अतिसूक्ष्म ज्योति के आकार में की गई है। जो हमारे शरीर में भृकुटी के बीच निवास करती है।
श्री गुरु ग्रंथ साहब जी में आत्मा के विषय में कहा गया है:-
"मन तु ज्योत स्वरूप है, अपना मूल पछांण " page 441
अर्थात:- अरे मन(आत्मा को दर्शाया)! तू ज्योति स्वरूप है अपना मूल पहचान।
हे मेरे मन तू उस परमात्मा के नूर की तरह है। अर्थात the nature of soul is just like a supreme light.
कबीर ग्रंथ साखी पेज नंबर 58 कबीर साहब जी ने आत्मा को ज्योति का प्रकाश स्वरूप माना है। शरीर दीपक है और आत्मा बत्ती है। उन्होंने कहा कि
" मंदिर माँही झबूकति, दीवा कैसी ज्योति।
हंस बटाऊ चली गया, काढ़ौ घर की ज्योति।"
अर्थातः- मनुष्य मंदिर या भवन के समान है। जो ज्योति स्वरुप आत्मा से दीप्तिमान है। ज्योति का विलय हो जाने पर इस ज्योति भवन में अंधकार छा जाता है। और निष्प्राण शरीर व्यर्थ वस्तु की तरह घर से हटा दिया जाता है।
गीता अध्याय 08/10 में बताया गया है की आत्मा भ्रकुटी में स्थित होने के कारण ही योगियों की चेतना भ्रकुटी में केंद्रीभूत होती है।
श्रीमद् भगवत गीता अध्याय दूसरे के 25 वे श्लोक में कहा गया
"अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि।।"
अर्थात:- आत्मा अचिंत्य और अव्यक्तमूर्त्त है। अर्थात एक ज्योति बिंदु है। यह विभु नही। अचिंत्य का अर्थ है सूक्ष्मातिसूक्ष्म अथवा मन द्वारा आग्राह्य (inconceivable) वह तो बिंदु अथवा पॉइंट ही हो सकता है। पॉइंट अथवा बिंदु ही अच्छेध भी है और अमर अथवा अविनाशी भी।
पतंजलि योग दर्शन में भी बताया गया भृकुटी के मध्य में स्थित आज्ञा चक्र होता है। जो आत्मा का स्थान माना जाता है। और इसे तीसरा नेत्र भी कहा जाता है आत्मा का तीसरा नेत्र ज्ञान नेत्र और ध्यान के द्वारा आत्मा रूपी प्रकाश को भ्रकुटी के मध्य में ही देखा जाता है।
आत्मा का स्वरूप ज्योति बिंदु रूप है तो बिंदु का कोई माप थोड़े ही होता है। जॉमट्री में भी इसका कोई आकार नहीं माना जाता। बिंदु को ना तो आयताकार माना जाता है, ना वर्गाकार ना वृत्ताकार और ना ही उसका अन्य कोई आकार है। बल्कि रेखागणित के अनुसार भी निराकार ज्योतिबिंदु ही कहना ठीक है।
मेडिकल साइंसेस के द्वारा भी यह प्रमाणित किया गया कि मस्तिष्क के भीतर हाइपोथैलेमस और पिट्यूटरी ग्लैंड के बीच में आत्मा रूपी ऊर्जा शक्ति एनर्जी का निवास स्थान है। और यहीं पर ही आत्मा लघु मस्तिष्क (cerebellum) तथा वृहद मस्तिष्क (cerebrum) से संबंधित है और स्नायु मंडल (motor nerves and sensory nerves) द्वारा कार्य करती है तथा अनुभव करती हैं। वह इसे Third Eye of Wisdom कहते हैं।
विज्ञान ने इसे Energy कहा है।
"Energy neither created nor destroyed"
आत्मा का निवास स्थान कहाँ होता है ??
आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिन्दु है। जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करता है। जैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिन्दु-सा दिखाई देता है, वैसे ही दिव्य-दृष्टि द्वारा आत्मा भी एक तारे की तरह ही दिखाई देती है। इसीलिए एक प्रसिद्ध पद में कहा गया है:
भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा, गरीबां नूं साहिबा लगदा प्यारा।
इसके कुछ उदाहरण :-
मन्दिर में माथे पर टीका लगाया जाता है।
अक्सर गुरु लोग तिलक भी यही लगाते है।
महिलायें भी बिंदी यहीं लगाती हैं।
चर्च में यही पर एक पवित्र जल के छींटे माथे पर देते हैं तथा क्रॉस को माथे से लगते हैं।
आम व्यक्ति भी जब अपनी किस्मत के लिए "हाय मेरी किस्मत" कहता तो कभी दिल पर नहीं, मस्तिष्क पर ही हाथ रखते।
बहुत गहरी सोच में हो तो भी मस्तिष्क पर हाथ रख कंसन्ट्रेट करता है।
आजकल जो meditation सिखाया जाता है। वो भी मस्तिष्क पर ही एकाग्र कराते हैं।
कईयों से इस बारे में पूछने पर कि आत्मा का निवास स्थान कहाँ है तो वे कहते सारे शरीर में व्याप्त होती या तो ह्रदय में।
कोई कहते हृदय में आत्मा का निवास स्थान है :-
जब किसी का heart transplant होता है तो एक की आत्मा दूसरे में जानी चाहिए मगर ऐसा कुछ नहीं होता है। तो इससे साबित होता है की आत्मा ना पूरे शरीर में ना ही ह्दय में रहती।
हृदय तो केवल रक्त संचारण का केंद्र है जबकि आत्मा मस्तिष्क के द्वारा पूरे शरीर का नियंत्रण करती है। हम देखते हैं कि शरीर की महत्वपूर्ण कर्मेन्द्रियाँ जिनके द्वारा आत्मा कार्य और अनुभव करती है वो मस्तिष्क के आस पास ही है।
अब पूरी बॉडी में कौनसा organ बहुत important है और कौनसा ऐसा system है जिसके बिना जीवन नामुमकिन है?
Liver transplant होता है। liver cell में regenerate होने की क्षमता है।
एक किडनी पर भी मनुष्य जी सकता है।
Lung में कोई problem हो तो mechanical ventilator पर रखते है। lung भी transplant होते है।
तो अब बाकि रहा ब्रेन जिसका transplant आज तक किसी का हुआ नही है और नहीं होगा। ब्रेन के बिना कोई मनुष्य जी नहीं सकता।
Coma वाला पेशेंट भी बहुत दिन जीते है क्योंकि उसका ब्रेन & CNS काम करता है।
आइये देखते है वैज्ञानिकों के पॉइंट ऑफ़ व्यू से आत्मा के अस्तित्व की क्या राय है?
विज्ञान के अनुसार हल्की चीज हमेशा ऊपर रहती है। अर्थात ह्रदय नहीं मस्तिष्क में ही उसका निवास स्थान हो सकता है।
इस दुनिया के महान वैज्ञानिक मैक्स प्लैंक ने बताया कि मानव शरीर में कहीं एकमात्र ऐसा बिंदु है, जहां पर साइंस के नियम लागू नहीं होते, यह बिंदु ही मनुष्य के सुख और दु: का कारण है। कहने को यह बिंदु है पर यह अपने आप में एक पूरा संसार है।
आँखें मानव की जो बहुत छोटी सी पुतली है। जिसके द्वारा ही इस संसार को देखता है। मानव की आँख सब कुछ नहीं देख सकती। बहुत से signal, waves, ultraviolet rays, रिमोट से निकलने वाली किरणें, बहुत सी तरंगें, टी.वी. रिमोट के अंदर से निकलने वाली किरणें ऐसी अनेक किरणें जिसे हम अपनी आंखों से नहीं देख सकते। इसका बहुत ही कम हिस्सा हमारी आंख देख पाती हैं। ऐसे ही आत्मा को इन आखों के द्वारा नही देख सकते।
आत्मा इन आँखों से दिखाई क्यों नहीं देती है? कारण ??
एक तो आत्मा अति सुक्ष्म है। दूसरा इन 5 तत्वों से बनी आँखों द्वारा हम 5 तत्वों से बनी वस्तु ही देख सकते हैं। जैसे सोने से बनी चुम्बक सोना, लोहे से बनी चुम्बक लोहा ही खींच सकती।
आत्मा तो इन 5 तत्वों से बनी ही नहीं है। इसलिए दिख नहीं सकती। हाँ अगर आत्मा को देखना है तो इन 5 तत्वों के भान (consciousness ) से परे जा कर संभव है।
कुछ बुद्धिजीवी वैज्ञानिक कहते हैं कि आत्मा को हम देख नहीं सकते, उनका अस्तित्व नहीं है। पर जरूरी नहीं हर चीज को हम देख सकें। जैसे गुलाब की खुशबु है उसे हम देख नहीं सकते तो इसका मतलब ये तो नहीं ना कि उनका अस्तित्व नहीं है, पर हम उनको महसूस कर सकते हैं, उसी तरह आत्मा को देखा नहीं जाता महसूस किया जाता है।
कार्ल गस्तव जंग जो की अच्छे मनोवैज्ञानिक हुए हैं, उन्होंने कहा यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो कि किसी साधन द्वारा आत्मा का फ़ोटो खींच कर बताया जा सके।
लेकिन कैरेलिअन कैमरे द्वारा मनुष्य के सुक्ष्म शरीर का (Aura) का फ़ोटो लिया जा सकता है। आत्मा शरीर में विद्यमान है। जो एक Aura का निर्माण करती है। जिसे हम प्रकाश की काया भी कहते हैं।
                                         आत्मा के विषय में श्रीमद्भगवद्गीता कहती है:-
                                        नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः।
                       चैनं क्लेदयन्त्यापो शोषयति मारुतः।।।२३।।
भावार्थ :- आत्माको शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता और वायु सूखा नहीं सकती।
श्लोक :                       ।।वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरो पराणि।
                                            शरीराणि विहाय जीर्णा - न्यन्यानि संयाति नवानि देही ।।-गीता
भावार्थ : जीर्ण वस्त्र को जैसे तजकर नव परिधान ग्रहण करते हैं। वैसे ही जर्जर तन को तजकर आत्मा नया शरीर धारण करती है।
शरीर हर क्षण नश्वर है। शीर्यते इति शरीरम्।। हमे बचपन की बात भी स्मरण होती है। श्लोक से सिद्ध है की शरीर तो प्रति क्षण बदलता है new epithelium (नई खाल) जाती है।
पिछले जन्म की याद और स्मृति
जब एक आत्मा एक शरीर छोड़ती है तो दूसरा शरीर धारण करती है। कुछ बालक आत्माओ को अपने past life के बारे में पता होता है कि पास्ट लाइफ की सारी जानकारी होती है। फिर सर्च करने पर पता चलता है की बातें सारी सही है। इसे वैज्ञानिक रिति से प्रूव किया गया है, इन बातों से पता चलता है कि आत्मा अजर अमर अविनाशी है। जिसे कोई destroy नहीं कर सकता।
इसके अलावा कई बार हमने देखा है out of body experience. जब किसी की death होती है और थोडी देर मे वापस जान जाती है तो वो इन्सान सबको बताता है कि शरीर से निकलने के बाद मैंने ये ये देखा। तो ये किसने देखा शरीर तो मर गया था। तो ये आत्मा ने देखा।
अगर ये prove है की हम कई जन्म लेते है तो definitely हम ये शरीर नही है जो नश्वर है। हम एक अविनाशी शक्ति पुंज आत्मा हैं।
इसे प्रूफ करने के लिए मनोचिकित्सक Hypnotism का सहारा लेते है। जिसमें मन की गति को इतनी धीमी कर देते है की आदमी पीछले जन्म में चला जाता हैं, चूँकि चिप रुपी आत्मा में सब फीड होता है उसकी पास्ट lives की सभी बातें तो patient को उनका past birth याद आने लगता है। जब पिछले जन्म में किसी व्यक्ति को ले जाते हैं तो उसे हम पास्ट लाइफ हिप्नोटिक रिग्रेशन कहते हैं। पिछले जन्म में वो कोई और शरीर में अलग स्थान पर वो ही व्यक्ति पार्ट प्ले कर रहा था। पिछले 30-40 जन्म तक की भाषा समय लिंग (स्त्री या पुरुष) भी बताते हैं।
वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को आर्वेक्स्ट्रेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन (आर्च-ओर) का नाम दिया है। इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा मस्तिष्क में न्यूरॉन के बीच होने वाले संबंध से कहीं व्यापक है। इसका निर्माण उन्हीं तन्तुओं से हुआ जिससे ब्रह्मांड बना था।
भारत में सदियो से पारंपरिक रूप से यह माना जाता रहा है कि आत्मा का अस्तित्व होता है और श्राद्ध पक्ष में उनका आह्वान भी किया जाता है।
विज्ञान का अर्थ ज्ञान के उस सिद्धान्त से है जो पदार्थो में छिपी अंतःशक्ति को खोजता है। वहीं धर्म का संबंध ज्ञान के उस सिद्धांत से है, जो चेतना के भीतर छिपी हुई अंत:शक्ति को खोजता है।
आज आवश्यकता है, धर्म और विज्ञान के संतुलन की। विज्ञान सुविधा देता है, धर्म शांति देता है। धर्म और विज्ञान एक दूसरे के परिपूरक हैं। जैसे शरीर और आत्मा का कोई विरोध नहीं, वैसे ही धर्म और विज्ञान का कोई विरोध नहीं है।
विज्ञान मनुष्य का शरीर है और धर्म उसकी आत्मा।
ध्यान रखें कि जैसे शरीर मालिक नहीं हो सकता है, वैसे विज्ञान भी मालिक नहीं हो सकता। अगर विज्ञान के युग में धर्म नहीं होगा, तो विज्ञान मृत्यु का कारण बन जाएगा। विज्ञान बहुत अच्छा होते हुए भी एक अति है, जो हमेशा खतरनाक है। धर्म उसे संतुलन देकर मनुष्यता को इसके खतरे से बचा सकता है। इसलिए पूरी दुनिया में धर्म के पुनरुत्थान का समय चुका है। धर्मपरायणता मनुष्य के मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। विज्ञान बहिर्मुखी है, जबकि धर्म अंतर्मुखी।
व्यापक को खोजने की नहीं, पहचानने की आवश्यकता है। अपने आपको आत्मा निश्चय करने की आवश्यकता है। आत्म निश्चय होने पर शक्तियों की प्राप्ति होती है, शक्तियों को खोजने की जरुरत नहीं पड़ती।
विज्ञान मस्तिष्क को शरीर का संचालन करने वाला प्रमुख अवयव मानता है।परन्तु बिना आत्मा के मस्तिष्क कुछ नहीं कर सकता। आत्मा के बिना मस्तिष्क की मृत्यु हो जाती है वो एक सेकंड भी जीवित नहीं रह सकता। यदि मस्तिष्क ही शरीर का संचालन करने वाला प्रमुख अवयव होता तो विज्ञान ने अब तक मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली होती।
विज्ञान ने भौतिक उन्नति बहुत की लेकिन उससे सुख, शांति, आनंद की प्राप्ति नहीं हुई जिसकी आज अत्यंत आवश्कता है। उसे केवल आध्यात्मिकता से प्राप्त किया जा सकता है।
आध्यात्मिकता अर्थात आत्मा का अध्ययन l जिस प्रकार एक अभिनेता किसी भूमिका का निर्वाह करता है। लेकिन उसे मालूम होता है कि जिसकी भूमिका वह कर रहा है वह वही नहीं हैं l उसी तरह आत्मा भी इस विश्व रंगमंच पर शरीर के माध्यम से अलग-अलग भूमिका अर्थात एक अभिनेता का पार्ट बजाती है।
जिस तरह एक उपकरण को चलाने के लिए ऊर्जा की आवश्कता होती है। उसी प्रकार शरीर को चलाने के लिए शक्ति की जरूरत पड़ती है। जिसे आत्मा, चैतन्य, जीवंत, सनातन सत्ता कहते हैं।
रेमण्डस मूडी ने सत्य घटनाओं पर आधारित मौत के बाद पुनः जीवित Life After Death पुस्तक लिखी है। जिसमें अनेकों अनुभव दिये हैं। जो मरने के बाद जीवित हो जाते हैं। अमेरिका के एक मरीज जिसका नाम जोन ली था मृत घोषित होने के पश्चात उसकी श्वास की गति शुरू हो गई. उन्होंने अपना अनुभव इस तरह बताया है कि ऐसा अनुभव हुआ पाँच तत्वों की काली गुफा में मैं एक सफेद लाईट हूँ। इसको पार करने के बाद सफेद लाईट और आगे लाल सुनहरे प्रकाश की दुनिया दिखी। वहाँ सुन्दर प्रकाशमय ज्योति थी। जो मुझे सुख, शांति अनुभव करा रही थी। थोड़ी देर में मुझे सुनाई दिया कि आपके इस शरीर के कर्म बंधन पूर्ण नहीं हुए है। अतः आपको वापस भेजा जा रहा है और मैं पुनः इस शरीर मैं गया।
इस प्रकार हर वर्ग के लोग चाहे वो वैज्ञानिक हो या शास्त्रज्ञाता या कोई भी धर्म। सभी ने ये माना है कि शरीर और आत्मा अलग-अलग हैं l शरीर जड़ है और आत्मा चैतन्य है।
                                            ◆◆◆◆◆◆◆ओम शांति◆◆◆◆◆◆
डॉ.मनोज कुमार शर्मा (BHMS)
होम्योपैथिक चिकित्सक,नेचुरल हीलिंग,स्पिरिचुअल हीलिंग /आहार व पोषण चिकित्सा #DrManojKumarSharma
#HomeopathicTreatment
#DrMKSharma


डॉ.मनोज कुमार शर्मा

होमियोपैथी ,आहार चिकित्सा,अध्यात्म चिकित्सा,ध्यान योग मेडिटेशन व स्वस्थ्य दिनचर्या से सम्बंधित किसी भी जानकारी के लिए संपर्क करे - व्हाट्सअप करें -9307875737

सम्पूर्ण स्वास्थ्य

समूर्ण,सुरक्षित,सरल,स्थ्यायी और कोमल उपचार

Blog Archive

Popular Posts

Recent Posts

Dr.Manoj Kumar Sharma

होमियोपैथी ,आहार चिकित्सा,अध्यात्म चिकित्सा,ध्यान योग मेडिटेशन व स्वस्थ्य दिनचर्या से सम्बंधित किसी भी जानकारी के लिए संपर्क करे - व्हाट्सअप करें -9307875737
Powered by Blogger.

मेरे बारे में

My photo
I am DR.MK.SHARMA full name Dr.Manoj Kumar Sharma,Registered Homeopathic Consulting Physician,BHMS.I complete my degree in 2010.Mission is to spread awareness about Holistic Health and an ecological sustainable compassionate lifestyle.

Search This Blog

फेसबुक पेज

यूट्यूब

Comments

Popular Posts